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What are the most famous proverbs?

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“अकेली मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है” अर्थात एक दुष्ट व्यक्ति है पूरे समाज को दूषित कर देता है।
“अंधों में काना राजा” अर्थात गुणहीन व्यक्तियों में अधिक कम गुण वाला व्यक्ति।
“अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत” अर्थात उचित समय निकल जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं होता।
“अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है” अर्थात अपने घर में निर्बल व्यक्ति भी बलवान होता है।
“आ बैल मुझे मार” अर्थात जानबूझकर स्वयं के लिए मुसीबत मोल लेना।
“आम के आम गुठलियों के दाम” अर्थात दोहरा लाभ होना या अधिक लाभ होना।
“इधर कुआं उधर खाई” अर्थात दोनों ओर से संकट।
“एक हाथ दे एक हाथ ले” अर्थात लेना और देना।
“ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छाया” अर्थात विधाता की विचित्रता।
“ऊंची दुकान फीका पकवान” अर्थात प्रदर्शन अधिक एवं वास्तविकता कम।
“उल्टा चोर कोतवाल को डांटे” अर्थात अपराधी का निर्दोष व्यक्ति पर हावी होना।
“एक हाथ से ताली नहीं बजती” अर्थात लड़ाई झगड़ा केवल एक पक्ष से नहीं होता।
“एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी” अर्थात अपराधी होकर भी अकड़ना।
“एक म्यान में दो तलवार नहीं रह सकती” अर्थात एक ही स्थान पर दो समान गुणों वाले व्यक्ति नहीं रह सकते।
“रस्सी जल गई मगर बल नहीं गया” अर्थात कुछ ना होकर भी घमंड करना।
“कहां राजा भोज कहां गंगू तेली” अर्थात दो व्यक्तियों के बीच में गहरा अंतर होना।
“काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती” अर्थात चालाकी से केवल एक ही बार काम निकाला जा सकता है।
“कौवा चला हंस की चाल” अर्थात दूसरों की नकल करना।
“एक पंथ दो काज” अर्थात एक ही कार्य से दोहरा लाभ होना।
"बाँझ का जाने प्रसव की पीड़ा" अर्थात पीड़ा को सहकर ही समझा जा सकता है।
"बाड़ ही जब खेत को खाए तो रखवाली कौन करे" अर्थात रक्षक का भक्षक हो जाना।
"बाप भला न भइया, सब से भला रूपइया" अर्थात धन ही सबसे बड़ा होता है।
"बाप न मारे मेढकी, बेटा तीरंदाज़" अर्थात छोटे का बड़े से बढ़ जाना।
"बाप से बैर, पूत से सगाई" अर्थात पिता से दुश्मनी और पुत्र से लगाव।
"बारह गाँव का चौधरी अस्सी गाँव का राव, अपने काम न आवे तो ऐसी-तैसी में जाव" अर्थात बड़ा होकर यदि किसी के काम न आए, तो बड़प्पन व्यर्थ है।
"बारह बरस पीछे घूरे के भी दिन फिरते हैं" अर्थात एक न एक दिन अच्छे दिन आ ही जाते हैं।
"बासी कढ़ी में उबाल नहीं आता" अर्थात काम करने के लिए शक्ति का होना आवश्यक होता है।
"बासी बचे न कुत्ता खाय" अर्थात जरूरत के अनुसार ही सामान बनाना।
"बिंध गया सो मोती, रह गया सो सीप" अर्थात जो वस्तु काम आ जाए वही अच्छी।
"अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता" अकेला आदमी लाचार होता है
"अधजल गगरी छलकत जाय" डींग हाँकना
"आँख का अँधा नाम नयनसुख" गुण के विरुद्ध नाम होना
"आँख के अंधे गाँठ के पूरे" मुर्ख परन्तु धनवान
"आग लागंते झोपड़ा, जो निकले सो लाभ" नुकसान होते समय जो बच जाए वही लाभ है
"आगे नाथ न पीछे पगही" किसी तरह की जिम्मेदारी न होना
"आम के आम गुठलियों के दाम" अधिक लाभ
"ओखली में सर दिया तो मूसलों से क्या डरे" काम करने पर उतारू
"ऊँची दुकान फीका पकवान" केवल बाह्य प्रदर्शन
"एक पंथ दो काज" एक काम से दूसरा काम हो जाना
"कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली" उच्च और साधारण की तुलना कैसी
"घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध" निकट का गुणी व्यक्ति कम सम्मान पाटा है, पर दूर का ज्यादा
"चिराग तले अँधेरा" अपनी बुराई नहीं दिखती
"जिन ढूंढ़ा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठ" परिश्रम का फल अवश्य मिलता है
"नाच न जाने आँगन टेढ़ा" काम न जानना और बहाने बनाना
"न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी" न कारण होगा, न कार्य होगा
"होनहार बिरवान के होत चीकने पात" होनहार के लक्षण पहले से ही दिखाई पड़ने लगते हैं
"जंगल में मोर नाचा किसने देखा" गुण की कदर गुणवानों बीच ही होती है
"कोयल होय न उजली, सौ मन साबुन लाई" कितना भी प्रयत्न किया जाये स्वभाव नहीं बदलता
"चील के घोसले में माँस कहाँ" जहाँ कुछ भी बचने की संभावना न हो
"चोर लाठी दो जने और हम बाप पूत अकेले" ताकतवर आदमी से दो लोग भी हार जाते हैं
"चंदन की चुटकी भरी, गाड़ी भरा न काठ" अच्छी वास्तु कम होने पर भी मूल्यवान होती है, जब्कि मामूली चीज अधिक होने पर भी कोई कीमत नहीं रखती
"छप्पर पर फूंस नहीं, ड्योढ़ी पर नाच" दिखावटी ठाट-वाट परन्तु वास्तविकता में कुछ भी नहीं
"छछूंदर के सर पर चमेली का तेल" अयोग्य के पास योग्य वस्तु का होना
"जिसके हाथ डोई, उसका सब कोई" धनी व्यक्ति के सब मित्र होते हैं
"योगी था सो उठ गया आसन रहा भभूत" पुराण गौरव समाप्त
"आंख के अंधे नाम नयनसुख" नाम और गुण में विरोध होना, गुणहीन को बहुत गुणी कहना।
"आंखों के आगे पलकों की बुराई" किसी के भाई- बन्धुओं या इष्ट-मित्रों के सामने उसकी बुराई करना।
"आंखों पर पलकों का बोझ नहीं होता" अपने कुटुम्बियों को खिलाना-पिलाना नहीं खलता। या काम की चीज महंगी नहीं जान पड़ती।
"आंसू एक नहीं और कलेजा टूक-टूक" दिखावटी रोना।
 "आई है जान के साथ जाएगी जनाजे के साथ" वह विपत्ति या बीमारी जो आजीवन बनी रहे।
"आ गई तो ईद बारात नहीं तो काली जुम्मे रात" पैसे हुए तो अच्छा खाना खायेंगे, नहीं तो रूखा-सूखा ही सही।
"आई मौज फकीर को, दिया झोपड़ा फूंक" विरक्त(बिगड़ा हुए) पुरुष मनमौजी होते हैं।
"आए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास" जिस काम के लिए गए थे, उसे छोड़कर दूसरे काम में लग गए।
"आगे कुआं, पीछे खाई" दोनों तरफ विपत्ति होना।
"आगे नाथ न पीछे पगहा, सबसे भला कुम्हार का गदहा या (खाय मोटाय के हुए गदहा)" जिस मनुष्य के कुटुम्ब में कोई न हो और जो स्वयं कमाता और खाता हो और सब प्रकार की चिंताओं से मुक्त हो।
"आठों पहर चौंसठ घड़ी" हर समय, दिन-रात।
"आठों गांठ कुम्मैत" पूरा धूर्त, घुटा हुआ।
"आत्मा सुखी तो परमात्मा सुखी" पेट भरता है तो ईश्वर की याद आती है।
"आधी छोड़ सारी को धावे, आधी रहे न सारी पावे" अधिक लालच करना अच्छा नहीं होता; जो मिले उसी से सन्तोष करना चाहिए।
"आपको न चाहे ताके बाप को न चाहिए" जो आपका आदर न करे आपको भी उसका आदर नहीं करना चाहिए।
"आप जाय नहीं सासुरे, औरन को सिखि देत" आप स्वयं कोई काम न करके दूसरों को वही काम करने का उपदेश देना।
"आप तो मियां हफ्तहजारी, घर में रोवें कर्मों मारी" जब कोई मनुष्य स्वयं तो बड़े ठाट-बाट से रहता है पर उसकी स्त्री बड़े कष्ट से जीवन व्यतीत करती है तब ऐसा कहते हैं।
"आप मरे जग परलय" मूत्यु के बाद की चिन्ता नहीं करनी चाहिए।
"आप मियां मांगते दरवाजे खड़ा दरवेश" जो मनुष्य स्वयं दरिद्र है वह दूसरों को क्या सहायता कर सकता है?
"आ बैल मुझे मार" जान- बूझकर विपत्ति में पड़ना।
"आम के आम गुठलियों के दाम" किसी काम में दोहरा लाभ होना।
"आम खाने से काम, पेड़ गिनने से क्या काम? (आम खाने से मतलब कि पेड़ गिनने से? )" जब कोई मतलब का काम न करके फिजूल बातें करता है "तब इस कहावत का प्रयोग करते हैं।
"आया है जो जायेगा, राजा रंक फकीर" अमीर-गरीब सभी को मरना है।
"आरत काह न करै कुकरमू" दुःखी मनुष्य को भले और बुरे कर्म का विचार नहीं रहता।
"आस पराई जो तके, जीवित ही मर जाए" जो दूसरों पर निर्भर रहता है, वह जीवित रहते हुए भी मरा हुआ होता है।
"आस-पास बरसे, दिल्ली पड़ी तरसे" जिसे जरूरत हो, उसे न मिलकर किसी चीज का दूसरे को मिलना।
"इक नागिन अस पंख लगाई" किसी भयंकर चीज का किसी कारणवश और भी भयंकर हो जाना।
"इन तिलों में तेल नहीं निकलता" ऐसे कंजूसों से कुछ प्रप्ति नहीं होती।
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"अंडा सिखावे बच्चे को कि चीं-चीं मत कर" अर्थात जब कोई छोटा बड़े को उपदेश दे।
"बाँझ का जाने प्रसव की पीड़ा" अर्थात पीड़ा को सहकर ही समझा जा सकता है।
"बाड़ ही जब खेत को खाए तो रखवाली कौन करे" अर्थात  रक्षक का भक्षक हो जाना।
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